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अक्का

अक्का

गर्मी की रात थी। हवा का बहना बंद सा हो गया था। सूरज दिन मे आग उगल रहा था, जमीन रात मे तपतपा रही थी। घर के सभी लोग छत पर सोये हुए थे। आसमान मे तारे टिमटिमा रहे थे। गांव के बाहर वाले मंदिर से आती हुई भजन की

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अजनबी

अजनबी

गुटूर – गुटूर, खट - खट की आवाज से मेरी नींद खुली। हॉस्टल में मेरा पहला ही दिन था। नयी जगह होने के कारण रात में बडी मुश्किल से आँख लगी थी। खिडकी खोल कर देखा तो एक कबूतर खिडकी की कांच पर चोंच मार रहा था। सुबह की मेरी

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