Wednesday, November 20, 2019
मेरी कहानीहिंदी

अक्का

अक्का

गर्मी की रात थी। हवा का बहना बंद सा हो गया था। सूरज दिन मे आग उगल रहा था, जमीन रात मे तपतपा रही थी। घर के सभी लोग छत पर सोये हुए थे। आसमान मे तारे टिमटिमा रहे थे। गांव के बाहर वाले मंदिर से आती हुई भजन की आवाज रात कि शांती को भंग कर रही थी। अचानक आता कोई ठन्डी हवा का झोका सुकून दे जाता था। लेकिन मेरे दिल मे बेचैनी थी। सवालों और उलझनो का सैलाब सा आ रहा था। ना आसमान की खुबसुरती भा रही थी, ना ठन्डी हवा की ठंढक। बहुत सोचने के बावजूद मैं किसी नतीजे पर नही पहुँच पा रही थी। अखिरकार हिम्मत करके मैंने नानी से अक्का के बारे मे पूछ ही लिया।

अक्का। मेरी नानी की बहन थी। चूंकी मैं बचपन से नानी के घर रही, अक्का से मेरा खासा लगाव था। मेरा नाम भी अक्का ने ही रखा था। बचपन से मैं अक्का को एक स्वाभिमानी और खुद्दार स्त्री के रूप मे जनती थी। लेकिन आज मैने एक अलग अक्का देखी। उनका आत्मविश्वास चूर चूर हो गया था और उसकी जगह अफसोस, बेबसी और खेद ने ले ली थी।

गर्मी की छुट्टीयों मे मैं नानी के घर गयी थी। मेरी अक्का से मुलाकात हो सके इसलिये नानी ने अक्का को भी वहीँ बुलवा लिया था। उस दिन धूप काफी तेज थी। पेड का एक पत्ता तक नही हिल रहा था। दोपहर मे मैंने गांव की नयी दुकान से आइसक्रीम मंगवाई थी। अक्का को वह किसी दुसरे ग्रह की वस्तु की तरह अद्भुत लगी। किसी छोटे बच्चे की तरह उसने पुरे हाथ मुह भरने तक खाई। ऐसे प्रतीत हो रहा था की उसे बहुत दिनों बाद कुछ अच्छा खाना नसीब हुआ हो। उसे युं देखकर मैं मन ही मन किसी भुखे गरीब की सहायता करने की भावना से संतुष्ट हो रही थी। आइसक्रिम खाने के बाद अक्का ने मुझे अपने पास बुलाया। उनकी आँखे भर आई थी। मुझे अपने गले से लगाकर वह फूट फूट कर रोयी। वो मुझसे ऐसे लिपटी थी जैसे कोई कोमल लता सहारा पाते ही किसी वृक्ष को लिपट गयी हो। उसका दुःख देखकर मेरा दिल भर आया। मेरी चेतना सुन्न हो गयी थी। कुछ समय उपरांत वह सहमकर शांत हो गयी। लेकिन उसके मुह से एक लफ्ज न निकला। वह खुद्दार थी। अपनी लाचारी कैसे बता सकती थी? अक्का का यह रूप मेरे लिये बिलकुल अपरिचित था।

अक्का और नानी कुल आठ बहने थी। सभी बहनो के नाम सप्तसिंधु के नाम पर रखे हुए थे। मेरी नानी उनमे सबसे छोटी थी और सात नादियों के नाम भी खत्म हो गये थे तो उनका नाम समंदर रख दिया। उनके नाम सुनकर अनपढ लोगों की इस सुझ बूझ पर सहज ही आश्चर्य हो जाता था। अक्का दुसरे नंबर की बहन थी और उनका असल नाम सरस्वती था। सब उन्हें प्यार से अक्का कहकर बुलाते थे। उनकी माँ, मेरी नानी के जन्म होते ही चल बसी थी। बडी बहन होने के कारण अक्का ने सारी छोटी बेहनों की जिम्मेदारी खुद पर ले ली। उनको माँ कि भांति संभाला। गोरे रंग, सीधी नुकीली नाक और बडी, बोलती आंखो वाली अक्का निश्चित ही बचपन मे काफी सुन्दर रही होंगी! सहज ही उसकी शादी बहुत छोटी उम्र मे ही कर दी गयी थी। लेकिन शायद उसकी किस्मत मे कभी किसी का प्यार लिखा ही नही था। शादी के कुछ दिनों बाद ही उनकी अपने पती के साथ अलाहिदगी हो गयी। इसकी वजह अक्का ने कभी किसी को नही बतायी। ना ही उनसे यह पूछने का किसी को साहस हुआ! दूसरी शादी करने का तो उस जमाने मे सवाल ही पैदा नही होता था! वह मैके चली आयी। इसके उपरांत अक्का ने अपनी सारी जिंदगी बहनों की सेवा मे लगा दी। उन्होंने कभी भी उनको माँ की कमी महसूस नही होने दी। बहनों के बच्चों की विलादते, बल्कि उनके भी बच्चों की विलादते और हर छोटी से छोटी बिमारी मे उनकी सेवा शुश्रूषा करने मे हि उन्होंने अपनी जिंदगी बिता दी। सभी लोग अक्का की बहुत इज्जत करते थे। उनसे पूछे बगैर किसी बहन के घर मे कोई बडा काम नही होता था। उनके आगे कुछ भी बोलने की किसी की हिम्मत नही थी।

लेकिन वक्त के साथ जमाना बदल गया और लोग भी! अक्का का शरीर थक गया। अब उनसे काम नही होता। भाई के पोतों ने उन्हें संभालने से इन्कार कर दिया। बिना काम की आफत कौन संभाले! आज गाँव मे अक्का का एक मिट्टी का झोपडा हैं। उसमे न बिजली हैं, न पानी। बस एक दिया, एक चूल्हा, एक बिस्तर और दो चार बर्तन ! यही अक्का की कुल संपत्ती है। सालों वह वही रहती आयी है। अब उनमे खुद के लिए भी कुछ पकाने की ताकत नहीं रही। वह जैसे तैसे अपने लिए एक दो रोटी पका लेती है और वही रोटी दो वक्त संभालकर खाती है। लेकिन उनके झोपड़े में एक चीज़ भरपूर थी। और वह है खुद्दारी और स्वाभिमान ! उन्होंने कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाये। कभी भी अपनी किस्मत को नहीं कोसा। ना ही किसी से कोई अपेक्षा की। यहाँ तक की उन्होंने सरकारी योजना का लाभ लेने से भी इंकार कर दिया। उनका व्यक्तित्व किसी विशालकाय पहाड़ की भांति था; स्थिर, अविचल, अडिग! मेरी दृष्टि में वह एक आदर्श स्त्री थी।

कुछ दिनों पहले मेरी माँ से अक्का के बारे में बात हुयी थी। माँ की नज़र में अक्का एक घमंडी और अकडू औरत थी जिसने अपनी जिंदगी मे कभी किसी चीज़ के लिए कोई समझौता नहीं किया। अपने पति तक से रिश्ते की भीख नहीं मांगी। उनका मानना है की औरत को सहनशील होना ही पड़ता है। वह खुद को एक मिसाल समझती है जिसने सब तरह के दुःख और छल सहने के बावजूद किसी तरह की कोई शिकायत नहीं की और तभी जाकर उसे आज एक खुशहाल और सम्मानजनक जीवन मिल पाया है।

मैं समझ नहीं पा रही थी की अक्का के साथ ऐसा क्यों हुआ? उन दोनों में से कौन सही हैं? क्या आदर्श स्त्री के बारे में मेरी धारणा गलत थी? क्या वास्तव मे एक स्त्री को सहनशील और धैर्यशील होना ज़रूरी ही है? क्या उसका कोई स्वाभिमान नहीं? और क्या स्वाभिमान की कीमत उसे यूं चुकानी पड़ती है जैसे अक्का ने चुकाई है? क्या एक औरत को स्वाभिमान खोकर ही खुशहाल ज़िन्दगी नसीब हो सकती है? और क्या अक्का को अपनी खुद्दारी का पछतावा होता है? अगर नही तो फिर वो क्यों रोई ? उस घटना को आज चार साल हो गए हैं। अक्का की परिस्थिती मे कोई बदलाव नही आया है। वो आज भी वही है। अपने अंधेरे झोपडे मे, आत्माभिमान की रोशनी के सहारे जी रही है। आंखो की रोशनी कम हो गयी है पर उसकी आंखो मे आज भी वही चमक और आत्मविश्वास दिखाई देता है। उनके झुर्रीयों भरे चेहरे पर आज भी वही तेज है। अब दांत नही रहे पर अब भी वो उतनी ही खिलखिलाकर हंसती है। उनके सफेद बाल उनके अनुभव को उजागर करते हैं। यूँ तो मेरे मन में कई सवाल थे, पर मुझे एक सवाल का जवाब मिल गया था की उस दिन अक्का क्यों रोई. शायद मैने अक्का पर दया दिखाकर उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाई थी। उनका धैर्य जवाब दे गया था। उनका हृदय मेरी नजर मे अपने लिये दया नही सह पाया था। वो दया की नही, प्यार और सम्मान की भूखी थी। उनके जीवन भर का संचित स्वाभिमान आहत होता देख वह कैसे सह सकती थी ? वह अक्का है, उन्हें टूटना मंजूर है, झुकना नही!

रोहिणी गायकवाड, पुणे